Thursday, September 10, 2015

अन्त

आज अचानक से नज़र उस ओर सरक गयी...
उस कोने की तरफ जहाँ उसके जाने पर मनाही थी...
किसी ने कभी कहा नहीं था ऐसा.. 
पर अनकही बातों में यह बात नुमायां थी...

धूल की कई परतों हटाई...  मकड़ियों से लड़ाईयाँ भी लड़ीं...
बस एक फ़टी-पुरानी किताब ही दीमकों ने छोड़ी थी ... 
शायद उसका स्वाद उनकी टेस्ट-बड्स को भाया न हो ...

किताब पलटी तो याद आया की यह तो वही किताब है जो किसी कारणवश तब पढ़ नहीं पाया था मैं...
आज तक पता नहीं लगा मुझे की नायक-नायिका के जीवन को लेख़क ने आख़िरकार क्या रूप दिया ... 
पढ़ते समय अपने जहन में कई अंत सोचे थे मैंने इस कहानी के... यकायक सब वापिस आ गये... 
उत्साह में सोचा आज तो जान कर ही रहूँगा अंजाम क्या था उनका!

फ़टाफ़ट पन्ने पलटे और बड़ी मुश्किल से ढूँढा की कहाँ तक पढ़ा था दिन... 
और फिर से खो गया उस कहानी में... 
आख़िर तक पहुँचने ही वाला था तो देखा... 
वही पन्ने थे जिन्हें टेस्ट कर के शायद दीमकों ने रिजेक्ट कर दिया था...

कुछ कहानियों के अन्त जानना भाग्य में नहीं होता शायद ... 
या फ़िर कुछ कहानियों के अन्त यथार्थ से परे स्वप्नों में ही होते हैं... 
जहाँ ना कोई बन्दिश होती है... ना वास्तविकता... होती है तो निरंकुश कल्पना... 




2 comments:

Dharmendra said...

वाह!!
बहुत खुब....
वैसे भी कुछ कहानीयां अन्तहीन रेह्ने दे कर
हर बार नये नये अन्तकी कल्पना करते रेह्ना चाहिये....
जीवनमें कहां कुछ पुर्ण है...

Dharmendra said...

वाह!!
बहुत खुब....
वैसे भी कुछ कहानीयां अन्तहीन रेह्ने दे कर
हर बार नये नये अन्तकी कल्पना करते रेह्ना चाहिये....
जीवनमें कहां कुछ पुर्ण है...